Climate Justice पर CJI Suryakant का बड़ा बयान

On: August 29, 2026 2:54 PM
Climate Justice पर CJI Suryakant का बड़ा बयान

भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI Suryakant ने लंदन में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते वैश्विक बदलाव को लेकर अहम सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विकसित और विकासशील देशों के लिए ऊर्जा परिवर्तन की जिम्मेदारी और चुनौतियां एक जैसी नहीं हैं।

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कॉमनवेल्थ सचिवालय में 56 देशों के प्रतिनिधियों के साझा मंच पर बोलते हुए CJI Suryakant ने कहा कि जो देश आज औद्योगीकरण की प्रक्रिया में आगे बढ़ रहे हैं, उनसे तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की उम्मीद की जा रही है। वहीं, वर्तमान में विकसित कई देशों ने अपनी आर्थिक ताकत बनाने में कोयले और तेल जैसे पारंपरिक ईंधनों का लंबे समय तक इस्तेमाल किया।

विकासशील देशों पर जल्द बदलाव का दबाव CJI Suryakant

CJI ने इस बात पर जोर दिया कि स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बदलाव जरूरी है, लेकिन इसके लिए सभी देशों की परिस्थितियों को ध्यान में रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि किसी देश को अवास्तविक गति से ऊर्जा परिवर्तन के लिए मजबूर करने से नई आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।

उन्होंने जलवायु परिवर्तन के असर को भी असमान बताया। छोटे किसान, मछुआरे और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर समुदाय कई बार ऐसे पर्यावरणीय संकटों का सामना करते हैं, जिनमें उनका योगदान बेहद कम रहा है। इसके बावजूद उनकी जमीन, पानी और आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है।

कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम पर भी चिंता

स्वच्छ ऊर्जा के लिए जरूरी खनिजों का जिक्र करते हुए CJI Suryakant ने कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम जैसे संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता की ओर भी ध्यान दिलाया। इन खनिजों के खनन से पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। ऊर्जा परिवर्तन ऐसा होना चाहिए जिसमें इसकी कीमत कमजोर और संसाधन-निर्भर समुदायों को न चुकानी पड़े।

अदालतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण

CJI Suryakant ने जलवायु से जुड़े मामलों में न्यायपालिका की भूमिका पर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि कॉमनवेल्थ देशों की अदालतें एक-दूसरे के अनुभवों और सफल कानूनी उपायों से सीख सकती हैं। हालांकि, किसी भी समाधान को अपनाते समय संबंधित देश की संवैधानिक, सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण और विकास को हमेशा एक-दूसरे के विरोधी विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जरूरत ऐसे रास्ते तलाशने की है, जिसमें विकास की आवश्यकताओं के साथ पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।

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Neeru Sheokand

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